निरुपमा हत्याकांडः झूठ और सच की परतें- चौथी कड़ी
दिल्ली पहुंचे कोडरमा पुलिस के एक अधिकारी शिव प्रसाद ने दिल्ली में तीन दिनों तक प्रियभांशु के अलावा प्रियभांशु और निरुपमा के कुछ ऐसे दोस्तों से लंबी पूछताछ की थी जिनका भी नाम दोनों के बीच एसएमएस संवाद में आया था या प्रियभांशु के जवाब में जिनका जिक्र आया था.
6 मई को पहले दिन की पूछताछ में प्रियभांशु से निरुपमा और उसके रिश्तों के तमाम आयाम पर बहुत सारे सवाल किए गए. उससे ऐसे सवाल भी किए गए जिसे हम यहां नहीं लिख सकते लेकिन उन सवालों का मकसद यह मालूम या साबित करना था कि प्रियभांशु ने निरुपमा के साथ जबर्दस्ती संबंध बनाए थे. उससे बार-बार पूछा गया और कई बार तो एक साथ छह लोगों ने चिल्लाकर पूछा कि क्या निरुपमा से उसकी कभी अनबन हुई थी. हर सवाल का सच उसने बताया.
उसने पुलिस को ये भी बताया कि दोनों ने 6 मार्च को शादी करने का फैसला किया था और इसके लिए आर्य समाज मंदिर में अग्रिम भुगतान भी कर दिया गया था. इस शादी का निमंत्रण दोनों ने अपने भरोसेमंद और नजदीकी दोस्तों को दिया. कुछ दिल्ली भी आ गए थे और कुछ ने तोहफे खरीद लिए थे. लेकिन फिर निरुपमा ने शादी से पहले कहा कि वो अपने घर वालों को मनाने की एक कोशिश और करना चाहती है. निरुपमा के इस विचार पर प्रियभांशु ने भी सहमति दे दी.
पूछताछ में पुलिस वालों के दो सवाल ऐसे थे जिसका जवाब प्रियभांशु के पास नहीं था. पहला सवाल ये था कि उसे कैसे नहीं पता था कि निरुपमा मां बनने वाली है और दूसरा सवाल था कि निरुपमा ने उसे 29 अप्रैल की सुबह 5.39 बजे के बाद भी कुछ एसएमएस किए थे, जिसे उसने मिटा दिया है और उसके बारे में छुपा रहा है.
प्रियभांशु रंजन ने पुलिस को बताया कि अगर निरुपमा मां बनने वाली थी तो वो बच्चा उसका ही है लेकिन निरुपमा ने उसे ये नहीं बताया था, ये भी उतना ही सच है. जब इस पर भ्रम फैला तो कहा गया कि प्रियभांशु को ये कैसे नहीं पता हो सकता, वो लोगों को उल्लू बना रहा है. सच्चाई की तलाश में कुछ पत्रकारों ने स्त्री रोग विशेषज्ञों से बात की. इस बातचीत के बाद डॉक्टरों के हवाले से अखबारों में खबर छपी कि शरीर के अंदरूनी कारणों से यह संभव है कि खुद निरुपमा को ही इस बात का पता न हो कि वो मां बनने वाली है.
29 अप्रैल की सुबह 5.39 बजे के बाद के एसएमएस के सवाल पर प्रियभांशु ने बताया कि उसे मिला आखिरी एसएमएस सुबह 5.39 बजे का ही है. चौंकाने लायक बात यह भी है कि यह आखिरी एसएमएस उसे 28 अप्रैल की रात 8 बजे भी मिला था और उसी रात 8.52 बजे भी मिला था. एक ही एसएमएस उसे तीन बार मिले जो निरुपमा के मोबाइल से आए आखिरी तीन मैसेज थे और तीनों में संदेश एक ही था.
एसएमएस में निरुपमा ने प्रियभांशु को लिखा था, ‘मैं आने की कोशिश करूंगी. तुम पेशेंस रखो. और बिना मेरे कहे कोई एक्सट्रीम स्टेप मत उठाना. मेरी अंकिता से बात हुई है. तुम अपने आप को कुछ मत करना.’ इस एसएमएस से पहले भी दोनों के बीच 28 अप्रैल को मोबाइल पर एक बार बात हुई और कुछ एसएमएस आए-गए.
दोनों के बीच एसएमएस और फोन पर क्या बात हुई, इस पर अगले दिन बात करेंगे. इस पूछताछ में एक अहम बात ये थी कि कोडरमा से जो अधिकारी शिव प्रसाद पूछताछ के लिए दिल्ली आए थे उन्होंने पूछताछ के लिए बुलाए गए निरुपमा के एक मित्र को पूछताछ के बाद दो घंटा तक ब्रह्म ज्ञान दिया.
शिव प्रसाद ने उससे कहा, “एक अच्छे पेशेवर और एक अच्छा दोस्त तो बाद में बनोगे, पहले एक अच्छा इंसान बनो. एक अच्छा इंसान होने के नाते तुम्हारा फर्ज बनता था कि तुम उन्हें रोकते, उन्हें समझाते कि घर वालों की मर्जी से शादी करो, अगर घर वाले नहीं कहते हैं तो शादी मत करो. आजकल बच्चों का संस्कार खराब हो गया है. वो धर्म, जाति और संस्कार समझते ही नहीं. आप जैसे लोगों के कारण संस्कृति खराब हो रही है, ये आपकी पीढ़ी की समस्या है.”
इन अधिकारी महोदय ने ये भी कहा कि उनका एक बेटा और एक बेटी है, अगर उनके बच्चे ऐसा करते तो वो भी इसे बर्दाश्त नहीं करते. शिव प्रसाद ने ये नहीं बताया कि वो अपने बच्चों के जाति से बाहर मोहब्बत करने और शादी की जिद पर अड़ जाने पर क्या करते लेकिन उसे सहन नहीं करते तो कुछ असहनीय ही करते, इससे इनकार नहीं किया जा सकता है.
शिव प्रसाद के इस ब्रह्म ज्ञान को निरुपमा का मित्र जब मामले का ट्रायल शुरू होगा तो कोर्ट में हलफनामा के साथ दाखिल करेगा. यह इसलिए जरूरी है कि ऑनर किलिंग के मामले में पुलिस ने ऐसे अधिकारी को जांच में क्यों लगाया जो खुद ऐसे विचार, ऐसी मान्यताओं का गुलाम है. एक ऐसा अधिकारी जो निरुपमा और प्रियभांशु के रिश्ते को अपने पुरातन नजरिए से देख रहा है वो आदमी अपनी जांच की दिशा, जांच के बिन्दु और उसके नतीजे कहां ले जाएगा, इसकी कल्पना करके कानून की धड़कन तेज हो सकती हैं.
साभारः मोहल्ला
Thursday, May 27, 2010
रस्सी या दुपट्टा, दोनों में से कुछ नहीं ?
निरुपमा हत्याकांडः झूठ और सच की परतें- तीसरी कड़ी
निरुपमा के पिता धर्मेंद्र पाठक ने गोंडा से कोडरमा पहुंचने के बाद 30 अप्रैल को पुलिस को अपनी पत्नी सुधा पाठक के हवाले से लिखित बयान दिया, ‘....तो उसे पंखा से लटका मृत पायी. अगल-बगल के लोगों के सहयोग से उसे फांसी लगा रस्सी से नीचे उतारा गया’.
खुद निरुपमा की मां सुधा पाठक ने जब 7 मई को सीजेएम कोर्ट में नालिसी दायर किया तो उसमें वो लिखती हैं, ‘...कमरे के पंखे से अपना दुपट्टा का फंदा लगाकर आत्महत्या किया हुआ पाया.’
निरुपमा की मौत को आत्महत्या मानने वाले पत्रकारों ने लिखा है कि पुलिस से पूछताछ में निरुपमा की मां ने बताया, ‘मैं दौड़ कर पलंग पर चढ़ी और उसके गले में लगे फंदे को खोली. निरुपमा पलंग पर गिर गई. मेरे चिल्लाने की आवाज सुनकर कई लोग अंदर आ चुके थे. मैं दौड़कर सामने के बाथरूम में जाकर पानी लाई और निरुपमा के चेहरे पर जोर-जोर से मारने लगी. उसी दौरान निरुपमा की कराह सुनने को मिली और उसके बाद आस-पड़ोस से आए लोगों के साथ मिलकर पार्वती नर्सिंग होम ले गए जहां डॉक्टर ने उसे देखने के बाद मृत घोषित कर दिया.’
क्या निरुपमा के परिवार को रस्सी और दुपट्टे का अंतर नहीं पता है. उसके पिताजी जिसे रस्सी कह रहे हैं, उसकी मां उसे दुपट्टा कह रही हैं. पिता ने कहा कि पास-पड़ोस के लोगों की मदद से निरुपमा का शव पंखे से उतारा गया. मां ने पुलिस को बताया कि उन्होंने अकेले ही ऐसा कर लिया.
यहां यह बताना जरूरी है कि निरुपमा को जब मां की बीमारी की खबर देकर घर बुलाया गया था तो भाई समरेंद्र पाठक ने यह बताया था कि मां की रीढ़ की हड्डी टूट गई है. ऐसा निरुपमा ने प्रियभांशु और अपने दफ्तर के मित्रों से कहा था. निरुपमा की मां पीठ की बीमारी से परेशान हैं, ऐसा टीवी पर दिखी उनकी तस्वीरों से लगता है. बावजूद सुधा पाठक ने अकेले निरुपमा का शव पंखे से उतार लिया, यह कहना जितना आसान है, पचाना उतना ही मुश्किल है.
मां ने पुलिस को यह भी बताया है कि निरुपमा के शरीर के पलंग पर गिर जाने के बाद उन्होंने पानी का छींटा मारा तो वो कराह उठी. उसके बाद उसे पार्वती अस्पताल ले जाया गया. पिताजी ने पुलिस को लिखकर दिया कि उसे पंखे पर ही मृत पाया गया. जब पंखे पर ही निरुपमा की मौत हो चुकी थी तो नीचे गिरने के बाद वो कैसे कराह सकती है.
यह याद रखना बहुत जरूरी है कि 30 अप्रैल को धर्मेंद्र पाठक ने पुलिस को जो लिखित बयान दिया वो उन्होंने अपनी पत्नी का हवाला देते हुए दिया था. सुधा पाठक ने हत्या के आरोप में गिरफ्तार होने के बाद प्रियभांशु को दबाव में लेने के मकसद से 7 मई को नालिसी दायर की तो बयान बदल गया, तथ्य बदल गए. फिर याद दिलाना चाहता हूं कि झूठ बोलने का नुकसान ये है कि उसे हमेशा याद रखना पड़ता है और सच खुद-ब-खुद सामने आ जाता है.
हमने अब तक किसी डॉक्टर से इस बारे में नहीं पूछा है लेकिन हम जरूर पता करेंगे कि क्या फांसी के फंदे से उतारने के बाद अगर किसी में इतनी जान बची हो कि वो कराह उठे तो क्या यह संभव है कि उसकी जान चली जाए क्योंकि ऑक्सीजन की आपूर्ति तो फंदा से मुक्त होते ही बहाल हो चुकी होती है.
हमारी जानकारी यह है कि निरुपमा के शव को उनकी मां के अलावा किसी और ने पंखे से लटका हुआ नहीं देखा. जिसने भी देखा, सबने पलंग पर ही देखा. एक अपुष्ट खबर है, पुलिस को शायद सच पता हो, जब निरुपमा की मां से फंदे के बारे में पूछा गया तो उन्होंने किसी दूसरे कमरे से लाकर एक दुपट्टा दिया. अगर ऐसा है तो सवाल ये उठता है कि पंखे से शरीर नीचे गिर गया था लेकिन फंदा कैसे गिरा और गिरा तो दूसरे कमरे में कैसे चला गया. हो सकता है कि हमारी ये जानकारी गलत हो क्योंकि हम कोडरमा के बारे में सिर्फ सुनी-सुनाई या पुलिस रिकॉर्ड में आई बातों को ही जान पाते हैं.
हमें उम्मीद है कि इसका जवाब पुलिस की जांच से सामने आ जाना चाहिए. कोडरमा में निरुपमा ही थी जिसे हम जानते थे. वो नहीं है तो हमारी सोच, हमारी राय का कोडरमा में कोई मोल नहीं है. हमें कोडरमा में हो रही चीजें मीडिया से पता चलती हैं. कोडरमा के कुछ लोगों को लगता है कि प्रियभांशु ने ब्राह्मण न होते हुए भी एक ब्राह्मण लड़की से प्यार करके, शादी से पहले उसे मां बनाकर बहुत बड़ा गुनाह किया है और इसके लिए उसे फांसी की सजा मिलनी चाहिए.
हम सनातनी गैंग की ये हसरत पूरी नहीं होने देंगे क्योंकि ये देश संविधान के दायरे में केंद्र सरकार के बनाए कानूनों और समय-समय पर सुप्रीम कोर्ट के दिए गए फैसलों के हिसाब से चलता है. हमारा यकीन है कि कानून और कोर्ट के लिहाज से प्रियभांशु ने कोई भी गैर-कानूनी काम नहीं किया है.
साभार- मोहल्ला
निरुपमा के पिता धर्मेंद्र पाठक ने गोंडा से कोडरमा पहुंचने के बाद 30 अप्रैल को पुलिस को अपनी पत्नी सुधा पाठक के हवाले से लिखित बयान दिया, ‘....तो उसे पंखा से लटका मृत पायी. अगल-बगल के लोगों के सहयोग से उसे फांसी लगा रस्सी से नीचे उतारा गया’.
खुद निरुपमा की मां सुधा पाठक ने जब 7 मई को सीजेएम कोर्ट में नालिसी दायर किया तो उसमें वो लिखती हैं, ‘...कमरे के पंखे से अपना दुपट्टा का फंदा लगाकर आत्महत्या किया हुआ पाया.’
निरुपमा की मौत को आत्महत्या मानने वाले पत्रकारों ने लिखा है कि पुलिस से पूछताछ में निरुपमा की मां ने बताया, ‘मैं दौड़ कर पलंग पर चढ़ी और उसके गले में लगे फंदे को खोली. निरुपमा पलंग पर गिर गई. मेरे चिल्लाने की आवाज सुनकर कई लोग अंदर आ चुके थे. मैं दौड़कर सामने के बाथरूम में जाकर पानी लाई और निरुपमा के चेहरे पर जोर-जोर से मारने लगी. उसी दौरान निरुपमा की कराह सुनने को मिली और उसके बाद आस-पड़ोस से आए लोगों के साथ मिलकर पार्वती नर्सिंग होम ले गए जहां डॉक्टर ने उसे देखने के बाद मृत घोषित कर दिया.’
क्या निरुपमा के परिवार को रस्सी और दुपट्टे का अंतर नहीं पता है. उसके पिताजी जिसे रस्सी कह रहे हैं, उसकी मां उसे दुपट्टा कह रही हैं. पिता ने कहा कि पास-पड़ोस के लोगों की मदद से निरुपमा का शव पंखे से उतारा गया. मां ने पुलिस को बताया कि उन्होंने अकेले ही ऐसा कर लिया.
यहां यह बताना जरूरी है कि निरुपमा को जब मां की बीमारी की खबर देकर घर बुलाया गया था तो भाई समरेंद्र पाठक ने यह बताया था कि मां की रीढ़ की हड्डी टूट गई है. ऐसा निरुपमा ने प्रियभांशु और अपने दफ्तर के मित्रों से कहा था. निरुपमा की मां पीठ की बीमारी से परेशान हैं, ऐसा टीवी पर दिखी उनकी तस्वीरों से लगता है. बावजूद सुधा पाठक ने अकेले निरुपमा का शव पंखे से उतार लिया, यह कहना जितना आसान है, पचाना उतना ही मुश्किल है.
मां ने पुलिस को यह भी बताया है कि निरुपमा के शरीर के पलंग पर गिर जाने के बाद उन्होंने पानी का छींटा मारा तो वो कराह उठी. उसके बाद उसे पार्वती अस्पताल ले जाया गया. पिताजी ने पुलिस को लिखकर दिया कि उसे पंखे पर ही मृत पाया गया. जब पंखे पर ही निरुपमा की मौत हो चुकी थी तो नीचे गिरने के बाद वो कैसे कराह सकती है.
यह याद रखना बहुत जरूरी है कि 30 अप्रैल को धर्मेंद्र पाठक ने पुलिस को जो लिखित बयान दिया वो उन्होंने अपनी पत्नी का हवाला देते हुए दिया था. सुधा पाठक ने हत्या के आरोप में गिरफ्तार होने के बाद प्रियभांशु को दबाव में लेने के मकसद से 7 मई को नालिसी दायर की तो बयान बदल गया, तथ्य बदल गए. फिर याद दिलाना चाहता हूं कि झूठ बोलने का नुकसान ये है कि उसे हमेशा याद रखना पड़ता है और सच खुद-ब-खुद सामने आ जाता है.
हमने अब तक किसी डॉक्टर से इस बारे में नहीं पूछा है लेकिन हम जरूर पता करेंगे कि क्या फांसी के फंदे से उतारने के बाद अगर किसी में इतनी जान बची हो कि वो कराह उठे तो क्या यह संभव है कि उसकी जान चली जाए क्योंकि ऑक्सीजन की आपूर्ति तो फंदा से मुक्त होते ही बहाल हो चुकी होती है.
हमारी जानकारी यह है कि निरुपमा के शव को उनकी मां के अलावा किसी और ने पंखे से लटका हुआ नहीं देखा. जिसने भी देखा, सबने पलंग पर ही देखा. एक अपुष्ट खबर है, पुलिस को शायद सच पता हो, जब निरुपमा की मां से फंदे के बारे में पूछा गया तो उन्होंने किसी दूसरे कमरे से लाकर एक दुपट्टा दिया. अगर ऐसा है तो सवाल ये उठता है कि पंखे से शरीर नीचे गिर गया था लेकिन फंदा कैसे गिरा और गिरा तो दूसरे कमरे में कैसे चला गया. हो सकता है कि हमारी ये जानकारी गलत हो क्योंकि हम कोडरमा के बारे में सिर्फ सुनी-सुनाई या पुलिस रिकॉर्ड में आई बातों को ही जान पाते हैं.
हमें उम्मीद है कि इसका जवाब पुलिस की जांच से सामने आ जाना चाहिए. कोडरमा में निरुपमा ही थी जिसे हम जानते थे. वो नहीं है तो हमारी सोच, हमारी राय का कोडरमा में कोई मोल नहीं है. हमें कोडरमा में हो रही चीजें मीडिया से पता चलती हैं. कोडरमा के कुछ लोगों को लगता है कि प्रियभांशु ने ब्राह्मण न होते हुए भी एक ब्राह्मण लड़की से प्यार करके, शादी से पहले उसे मां बनाकर बहुत बड़ा गुनाह किया है और इसके लिए उसे फांसी की सजा मिलनी चाहिए.
हम सनातनी गैंग की ये हसरत पूरी नहीं होने देंगे क्योंकि ये देश संविधान के दायरे में केंद्र सरकार के बनाए कानूनों और समय-समय पर सुप्रीम कोर्ट के दिए गए फैसलों के हिसाब से चलता है. हमारा यकीन है कि कानून और कोर्ट के लिहाज से प्रियभांशु ने कोई भी गैर-कानूनी काम नहीं किया है.
साभार- मोहल्ला
पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर यकीन न करने की वजह नहीं
निरुपमा हत्याकांडः झूठ और सच की परतें- दूसरी कड़ी
निरुपमा के पिताजी और भाई के घर आने के बाद 30 अप्रैल को निरुपमा पाठक के शव का पोस्टमार्टम किया गया. पोस्टमार्टम विश्वसनीय, सटीक और स्पष्ठ हो इसके लिए एक डॉक्टर की बजाय मेडिकल बोर्ड से पोस्टमार्टम कराने की मांग आईआईएमसी एल्युमनी एसोसिएशन के सदस्यों ने झारखंड के पुलिस महानिदेशक, कोडरमा के उपायुक्त और आरक्षी अधीक्षक को फैक्स भेजकर की थी.
निरुपमा को न्याय अभियान कोडरमा प्रशासन की तारीफ करना चाहता है कि उसने मेडिकल बोर्ड बनाने का फैसला लेके राजनीतिक रूप से प्रभावशाली पाठक परिवार की तरफ से पोस्टमार्टम रिपोर्ट के साथ मन-मुताबिक छेड़छाड़ की तमाम संभावनाओं को खारिज कर दिया. 30 अप्रैल को पोस्टमार्टम हुआ. 2 मई को उसकी रिपोर्ट आई. रिपोर्ट में ये साफ तौर पर लिखा गया कि निरुपमा पाठक की मौत का कारण स्मॉदरिंग के कारण दम घुटना है.
स्मॉदरिंग के जरिए हत्या वह क्रूर प्रक्रिया है जब किसी की नाक और मुंह को एक ही बार दबाकर उसकी सांस रोक दी जाए. दम घुटने से मौत के मामलों में पोस्टमार्टम के लिए डॉक्टर समुदाय ने आम तौर पर तीन टर्म तय किए हैं. जब आदमी की मौत फांसी पर झूलने से हो तो उसे डॉक्टर एसफिक्सिया एज ए रिजल्ट ऑफ हैंगिंग लिखते हैं. जब किसी की गला दबाकर हत्या की जाती है तो उसमें एसफिक्सिया एज ए रिजल्ट ऑफ स्ट्रैंगुलेशन लिखा जाता है और जब किसी की हत्या नाक और मुंह दबाकर की जाए तो उसे एसफिक्सिया एज ए रिजल्ट ऑफ स्मॉदरिंग लिखते हैं.
डॉक्टरों का कहना है कि मेडिकल इतिहास में स्ट्रैंगुलेशन और स्मॉदरिंग का कोई भी मामला खुदकुशी का नहीं मिला है. यानी जब भी मौत के कारण में स्मॉदरिंग या स्ट्रैंगुलेशन लिखा हो तो यह माना जाता है कि पीड़ित या पीड़िता की हत्या हुई है.
पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर कुछ सवाल उठे. मौत का समय छोड़ दिया गया. विसरा नहीं रखा गया. भ्रूण भी नहीं सहेजा गया. एक पोस्टमार्टम रिपोर्ट किसी शव के बारे में कई तरह की सूचना का समेकित दस्तावेज होता है. इसमें मौत के कारण, समय के अलावा और भी कई चीजें शामिल हैं.
पोस्टमार्टम के लिए बनाए गए तीन डॉक्टरों के बोर्ड ने पोस्टमार्टम हाउस के बाहर पाठक परिवार और मीडिया की मौजूदगी में शव का अन्त्यपरीक्षण किया और पाया कि निरुपमा के गले की हड्डी नहीं टूटी है. उसके गले पर बना फंदे का निशान मौत के बाद का है. मौत का कारण स्मॉदरिंग के कारण दम का घुटना है.
मेडिकल बोर्ड ने यह राय एकमत रूप से दी. मौत का समय लिखना मेडिकल बोर्ड के सदस्य भूल गए जिसे बाद में सुधार लिया गया. विसरा नहीं रखने की वजह मेडिकल बोर्ड ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट में ही साफ कर दी और साफ-साफ लिखा कि विसरा रखने की जरूरत नहीं है.
फिर ये विवाद पैदा किया गया कि पोस्टमार्टम टीम में शामिल एक डॉक्टर का यह पहला पोस्टमार्टम था. यह बहुत गहराई से समझने की जरूरत है कि मेडिकल बोर्ड में अपनी जिंदगी का पहला पोस्टमार्टम कर रहे डॉक्टर साहब के साथ दो और डॉक्टर साहब भी थे जिन्होंने इससे पहले भी कई पोस्टमार्टम किए थे. मौत का कारण सिर्फ अपने करियर का पहला पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर साहब ने नहीं लिखा था, बाकी दोनों डॉक्टर साहब भी उस रिपोर्ट को तैयार करने में शामिल थे. ऐसा नहीं था कि नए वाले डॉक्टर साहब ने अवलोकन का नतीजा दिया और बाकी दोनों ने अनुशंसा या संस्तुति की. तीनों डॉक्टर पोस्टमार्टम के दौरान मौजूद थे, तीनों ने अपनी-अपनी आंखों से देखा और नतीजा एक पाया. मेडिकल बोर्ड का गठन इसी उद्देश्य से तो किया जाता है कि डॉक्टरों की एक बड़ी टीम की राय मिल सके और निरुपमा के मामले में तीन डॉक्टर इस बात पर एकमत हैं कि ये हत्या है, खुदकुशी नहीं.
एक और बात, जिन डॉक्टर साहब के करियर का पहला पोस्टमार्टम था वो भी मेडिकल की शिक्षा और डिग्री लेकर ही नौकरी में होंगे. उन्हें तय रूप से उनकी मेडिकल शिक्षा के दौरान पोस्टमार्टम करना सिखाया गया होगा. इसलिए यह कहना कि ये एक डॉक्टर का पहला पोस्टमार्टम था, रिपोर्ट में दर्ज मौत के कारण पर सवाल नहीं उठा सकता. कई सारे पोस्टमार्टम कर चुके अनुभवी डॉक्टर भी अपने करियर में कभी न कभी पहला पोस्टमार्टम करते होंगे.
मेडिकल बोर्ड ने विसरा नहीं रखने की वजह रिपोर्ट में ही लिख दी. भ्रूण को सुरक्षित नहीं रखने के उनके फैसले पर भी सवाल उठाए गए हैं. भ्रूण क्यों नहीं रखा गया ये तो डॉक्टर साहब लोग ज्यादा बेहतर जानते होंगे लेकिन अपनी समझ है कि अगर दुर्भाग्य से विवाद पैदा हुआ होता तो बच्चे के पिता की पड़ताल में इससे मदद मिलती. लेकिन प्रियभांशु रंजन ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है कि अगर निरुपमा गर्भवती थी तो बच्चा उसका ही था.
पोस्टमार्टम रिपोर्ट की समीक्षा करते वक्त विशेषज्ञ विसरा और भ्रूण नहीं रखने के मेडिकल बोर्ड के फैसले पर सवाल उठा रहे हैं. कोई विशेषज्ञ सीधे उनके अवलोकन के नतीजे यानी मौत के कारण पर सवाल नहीं उठा रहा. विधि द्वारा स्थापित किसी भी कोर्ट में किसी की अप्राकृतिक मौत का कारण बताने के लिए पोस्टमार्टम रिपोर्ट ही वैध दस्तावेज होता है और निरुपमा के मामले में यह रिपोर्ट कहता है कि उसकी हत्या की गई है.
एम्स के एक विशेषज्ञ साहब ने झारखंड पुलिस को बताया कि मौत का यह मामला उन्हें खुदकुशी ज्यादा प्रतीत होता है. उनके पास पुलिस ने राय बनाने के लिए दो चीजें मुहैया कराई थीं. पोस्टमार्टम रिपोर्ट और शव की नजदीक से ली गई तस्वीरें. कागज पर लिखे गए पोस्टमार्टम रिपोर्ट को देखकर तो किसी की मौत के कारण पर कोई राय बनाई ही नहीं जा सकती क्योंकि उसके लिए शव को देखना पड़ता है.
विशेषज्ञ साहब ने निश्चित रूप से निरुपमा की तस्वीरों को देखकर राय बनाई होगी. हम भी इसी तस्वीर की बात करते हैं. इस तस्वीर में निरुपमा के गले पर जो फंदे का दाग है, वह कंठ पर है. विशेषज्ञ साहब ने पता नहीं इस बात का ख्याल क्यों नहीं रखा कि पाठक परिवार यह कह रहा है कि निरुपमा पंखे से झूली है. पंखे की ऊंचाई से झूलने पर निरुपमा के बराबर वजन के किसी शख्स के गले पर फंदे का निशान कहां आएगा, क्या विशेषज्ञ साहब इसे सही से नहीं जोड़ पाए.
ये विशेषज्ञ साहब देश के सबसे बड़े अस्पताल के डॉक्टर हैं. उनके अस्पताल में पंखे या ऊंचाई से फंदा लगाकर खुदकुशी के कई मामले आए होंगे. उनके शवों की तस्वीर की लाइब्रेरी चेक करने पर शायद वो अपनी राय बदल पाएं. अनुभव कहता है कि ऐसे मामलों में फंदे का निशान सामने से ठुढ्ढी के थोड़ा नीचे लेकिन गर्दन के ऊपर बनता है और पीछे गर्दन के ऊपर चला जाता है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि फंदा शरीर के वजन के कारण उस हद तक ऊपर खिंच जाता है जहां से और आगे वह न जा सके. निरुपमा के गले पर बना निशान वो जगह नहीं है जहां कोई फंदा अटक जाए.
कुछ दिन पहले अखबारों में झारखंड के डीजीपी नियाज़ अहमद साहब के हवाले से खबर आई कि उन्हें उस फॉरेंसिक टीम ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी है जो हत्या का मामला दर्ज होने के दो-तीन बाद निरुपमा के घर का बारीकी से मुआयना करने रांची से कोडरमा गई थी. पुलिस दूसरी खेप में 17 मई को भेजे गए सामानों के फॉरेंसिक रिपोर्ट का इंतजार कर रही है.
घटनास्थल का मुआयना करने वाली पहली फॉरेंसिक टीम ने रिपोर्ट में कहा है कि जिस पंखे से निरुपमा के झूलने की बात कही गई है, वह पंखा पूरी तरह सुरक्षित है, पूरी तरह ठीक-ठाक है. मानो कोई भार उस पर पड़ा ही न हो. जब उस पर कोई भार ही नहीं पड़ा तो इसका मतलब ये है कि निरुपमा पंखे से नहीं झूली और अगर पंखे से नहीं झूली तो खुदकुशी की यह कहानी सच नहीं है.
इस फॉरेंसिक टीम ने भी कहा कि फंदे का निशान गर्दन पर जिस जगह और जिस तरह से बना है, वो पंखे से फांसी झूलने के बाद नहीं बनता. हमें यकीन है कि दूसरे दौर की फॉरेंसिक रिपोर्ट कुछ और सच सामने लाएगी.
निरुपमा को न्याय अभियान का भी मानना है कि निरुपमा के गर्दन पर फंदे का दाग मौत के बाद का है, इसलिए निरुपमा की मौत खुदकुशी नहीं है. फंदे के इस निशान को अगर मौत से पहले का पाया गया होता तो भी यह हैंगिंग न होकर स्ट्रैंगुलेशन होता और वो भी हत्या के दायरे में ही आता है.
साभार- मोहल्ला
निरुपमा के पिताजी और भाई के घर आने के बाद 30 अप्रैल को निरुपमा पाठक के शव का पोस्टमार्टम किया गया. पोस्टमार्टम विश्वसनीय, सटीक और स्पष्ठ हो इसके लिए एक डॉक्टर की बजाय मेडिकल बोर्ड से पोस्टमार्टम कराने की मांग आईआईएमसी एल्युमनी एसोसिएशन के सदस्यों ने झारखंड के पुलिस महानिदेशक, कोडरमा के उपायुक्त और आरक्षी अधीक्षक को फैक्स भेजकर की थी.
निरुपमा को न्याय अभियान कोडरमा प्रशासन की तारीफ करना चाहता है कि उसने मेडिकल बोर्ड बनाने का फैसला लेके राजनीतिक रूप से प्रभावशाली पाठक परिवार की तरफ से पोस्टमार्टम रिपोर्ट के साथ मन-मुताबिक छेड़छाड़ की तमाम संभावनाओं को खारिज कर दिया. 30 अप्रैल को पोस्टमार्टम हुआ. 2 मई को उसकी रिपोर्ट आई. रिपोर्ट में ये साफ तौर पर लिखा गया कि निरुपमा पाठक की मौत का कारण स्मॉदरिंग के कारण दम घुटना है.
स्मॉदरिंग के जरिए हत्या वह क्रूर प्रक्रिया है जब किसी की नाक और मुंह को एक ही बार दबाकर उसकी सांस रोक दी जाए. दम घुटने से मौत के मामलों में पोस्टमार्टम के लिए डॉक्टर समुदाय ने आम तौर पर तीन टर्म तय किए हैं. जब आदमी की मौत फांसी पर झूलने से हो तो उसे डॉक्टर एसफिक्सिया एज ए रिजल्ट ऑफ हैंगिंग लिखते हैं. जब किसी की गला दबाकर हत्या की जाती है तो उसमें एसफिक्सिया एज ए रिजल्ट ऑफ स्ट्रैंगुलेशन लिखा जाता है और जब किसी की हत्या नाक और मुंह दबाकर की जाए तो उसे एसफिक्सिया एज ए रिजल्ट ऑफ स्मॉदरिंग लिखते हैं.
डॉक्टरों का कहना है कि मेडिकल इतिहास में स्ट्रैंगुलेशन और स्मॉदरिंग का कोई भी मामला खुदकुशी का नहीं मिला है. यानी जब भी मौत के कारण में स्मॉदरिंग या स्ट्रैंगुलेशन लिखा हो तो यह माना जाता है कि पीड़ित या पीड़िता की हत्या हुई है.
पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर कुछ सवाल उठे. मौत का समय छोड़ दिया गया. विसरा नहीं रखा गया. भ्रूण भी नहीं सहेजा गया. एक पोस्टमार्टम रिपोर्ट किसी शव के बारे में कई तरह की सूचना का समेकित दस्तावेज होता है. इसमें मौत के कारण, समय के अलावा और भी कई चीजें शामिल हैं.
पोस्टमार्टम के लिए बनाए गए तीन डॉक्टरों के बोर्ड ने पोस्टमार्टम हाउस के बाहर पाठक परिवार और मीडिया की मौजूदगी में शव का अन्त्यपरीक्षण किया और पाया कि निरुपमा के गले की हड्डी नहीं टूटी है. उसके गले पर बना फंदे का निशान मौत के बाद का है. मौत का कारण स्मॉदरिंग के कारण दम का घुटना है.
मेडिकल बोर्ड ने यह राय एकमत रूप से दी. मौत का समय लिखना मेडिकल बोर्ड के सदस्य भूल गए जिसे बाद में सुधार लिया गया. विसरा नहीं रखने की वजह मेडिकल बोर्ड ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट में ही साफ कर दी और साफ-साफ लिखा कि विसरा रखने की जरूरत नहीं है.
फिर ये विवाद पैदा किया गया कि पोस्टमार्टम टीम में शामिल एक डॉक्टर का यह पहला पोस्टमार्टम था. यह बहुत गहराई से समझने की जरूरत है कि मेडिकल बोर्ड में अपनी जिंदगी का पहला पोस्टमार्टम कर रहे डॉक्टर साहब के साथ दो और डॉक्टर साहब भी थे जिन्होंने इससे पहले भी कई पोस्टमार्टम किए थे. मौत का कारण सिर्फ अपने करियर का पहला पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर साहब ने नहीं लिखा था, बाकी दोनों डॉक्टर साहब भी उस रिपोर्ट को तैयार करने में शामिल थे. ऐसा नहीं था कि नए वाले डॉक्टर साहब ने अवलोकन का नतीजा दिया और बाकी दोनों ने अनुशंसा या संस्तुति की. तीनों डॉक्टर पोस्टमार्टम के दौरान मौजूद थे, तीनों ने अपनी-अपनी आंखों से देखा और नतीजा एक पाया. मेडिकल बोर्ड का गठन इसी उद्देश्य से तो किया जाता है कि डॉक्टरों की एक बड़ी टीम की राय मिल सके और निरुपमा के मामले में तीन डॉक्टर इस बात पर एकमत हैं कि ये हत्या है, खुदकुशी नहीं.
एक और बात, जिन डॉक्टर साहब के करियर का पहला पोस्टमार्टम था वो भी मेडिकल की शिक्षा और डिग्री लेकर ही नौकरी में होंगे. उन्हें तय रूप से उनकी मेडिकल शिक्षा के दौरान पोस्टमार्टम करना सिखाया गया होगा. इसलिए यह कहना कि ये एक डॉक्टर का पहला पोस्टमार्टम था, रिपोर्ट में दर्ज मौत के कारण पर सवाल नहीं उठा सकता. कई सारे पोस्टमार्टम कर चुके अनुभवी डॉक्टर भी अपने करियर में कभी न कभी पहला पोस्टमार्टम करते होंगे.
मेडिकल बोर्ड ने विसरा नहीं रखने की वजह रिपोर्ट में ही लिख दी. भ्रूण को सुरक्षित नहीं रखने के उनके फैसले पर भी सवाल उठाए गए हैं. भ्रूण क्यों नहीं रखा गया ये तो डॉक्टर साहब लोग ज्यादा बेहतर जानते होंगे लेकिन अपनी समझ है कि अगर दुर्भाग्य से विवाद पैदा हुआ होता तो बच्चे के पिता की पड़ताल में इससे मदद मिलती. लेकिन प्रियभांशु रंजन ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है कि अगर निरुपमा गर्भवती थी तो बच्चा उसका ही था.
पोस्टमार्टम रिपोर्ट की समीक्षा करते वक्त विशेषज्ञ विसरा और भ्रूण नहीं रखने के मेडिकल बोर्ड के फैसले पर सवाल उठा रहे हैं. कोई विशेषज्ञ सीधे उनके अवलोकन के नतीजे यानी मौत के कारण पर सवाल नहीं उठा रहा. विधि द्वारा स्थापित किसी भी कोर्ट में किसी की अप्राकृतिक मौत का कारण बताने के लिए पोस्टमार्टम रिपोर्ट ही वैध दस्तावेज होता है और निरुपमा के मामले में यह रिपोर्ट कहता है कि उसकी हत्या की गई है.
एम्स के एक विशेषज्ञ साहब ने झारखंड पुलिस को बताया कि मौत का यह मामला उन्हें खुदकुशी ज्यादा प्रतीत होता है. उनके पास पुलिस ने राय बनाने के लिए दो चीजें मुहैया कराई थीं. पोस्टमार्टम रिपोर्ट और शव की नजदीक से ली गई तस्वीरें. कागज पर लिखे गए पोस्टमार्टम रिपोर्ट को देखकर तो किसी की मौत के कारण पर कोई राय बनाई ही नहीं जा सकती क्योंकि उसके लिए शव को देखना पड़ता है.
विशेषज्ञ साहब ने निश्चित रूप से निरुपमा की तस्वीरों को देखकर राय बनाई होगी. हम भी इसी तस्वीर की बात करते हैं. इस तस्वीर में निरुपमा के गले पर जो फंदे का दाग है, वह कंठ पर है. विशेषज्ञ साहब ने पता नहीं इस बात का ख्याल क्यों नहीं रखा कि पाठक परिवार यह कह रहा है कि निरुपमा पंखे से झूली है. पंखे की ऊंचाई से झूलने पर निरुपमा के बराबर वजन के किसी शख्स के गले पर फंदे का निशान कहां आएगा, क्या विशेषज्ञ साहब इसे सही से नहीं जोड़ पाए.
ये विशेषज्ञ साहब देश के सबसे बड़े अस्पताल के डॉक्टर हैं. उनके अस्पताल में पंखे या ऊंचाई से फंदा लगाकर खुदकुशी के कई मामले आए होंगे. उनके शवों की तस्वीर की लाइब्रेरी चेक करने पर शायद वो अपनी राय बदल पाएं. अनुभव कहता है कि ऐसे मामलों में फंदे का निशान सामने से ठुढ्ढी के थोड़ा नीचे लेकिन गर्दन के ऊपर बनता है और पीछे गर्दन के ऊपर चला जाता है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि फंदा शरीर के वजन के कारण उस हद तक ऊपर खिंच जाता है जहां से और आगे वह न जा सके. निरुपमा के गले पर बना निशान वो जगह नहीं है जहां कोई फंदा अटक जाए.
कुछ दिन पहले अखबारों में झारखंड के डीजीपी नियाज़ अहमद साहब के हवाले से खबर आई कि उन्हें उस फॉरेंसिक टीम ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी है जो हत्या का मामला दर्ज होने के दो-तीन बाद निरुपमा के घर का बारीकी से मुआयना करने रांची से कोडरमा गई थी. पुलिस दूसरी खेप में 17 मई को भेजे गए सामानों के फॉरेंसिक रिपोर्ट का इंतजार कर रही है.
घटनास्थल का मुआयना करने वाली पहली फॉरेंसिक टीम ने रिपोर्ट में कहा है कि जिस पंखे से निरुपमा के झूलने की बात कही गई है, वह पंखा पूरी तरह सुरक्षित है, पूरी तरह ठीक-ठाक है. मानो कोई भार उस पर पड़ा ही न हो. जब उस पर कोई भार ही नहीं पड़ा तो इसका मतलब ये है कि निरुपमा पंखे से नहीं झूली और अगर पंखे से नहीं झूली तो खुदकुशी की यह कहानी सच नहीं है.
इस फॉरेंसिक टीम ने भी कहा कि फंदे का निशान गर्दन पर जिस जगह और जिस तरह से बना है, वो पंखे से फांसी झूलने के बाद नहीं बनता. हमें यकीन है कि दूसरे दौर की फॉरेंसिक रिपोर्ट कुछ और सच सामने लाएगी.
निरुपमा को न्याय अभियान का भी मानना है कि निरुपमा के गर्दन पर फंदे का दाग मौत के बाद का है, इसलिए निरुपमा की मौत खुदकुशी नहीं है. फंदे के इस निशान को अगर मौत से पहले का पाया गया होता तो भी यह हैंगिंग न होकर स्ट्रैंगुलेशन होता और वो भी हत्या के दायरे में ही आता है.
साभार- मोहल्ला
दोहरा हत्याकांडः निरुपमा और उसके बच्चे की हत्या
निरुपमा हत्याकांडः झूठ और सच की परतें- पहली कड़ी
निरुपमा पाठक की हत्या और आत्महत्या के पेंच सुलझाने में झारखंड पुलिस को काफी मशक्कत करनी पड़ रही है. निरुपमा को न्याय अभियान का यकीन है कि यह हत्या है और दोहरी हत्या है. एक निरुपमा पाठक की और दूसरा निरुपमा पाठक और प्रियभांशु रंजन के प्यार की निशानी 10-12 सप्ताह के अजन्मे बच्चे की. हम ये भी मानते हैं कि ब्राह्णण जाति से बाहर निरुपमा की शादी की चाहत के कारण उसके परिवार ने हत्या की. निरुपमा के परिवार का कहना है कि ये खुदकुशी है और इसके लिए उसके प्रेमी प्रियभांशु रंजन ने उसे उकसाया और मजबूर किया.
शुक्रवार को हमने कहा था कि झूठ बोलने का झंझट ये है कि आपको उसे हमेशा याद रखना होता है कि किससे, कब और क्या कहा गया था. इस रिपोर्ट में आपको बार-बार इस बात का अहसास होगा कि झूठ बोलकर अपनी बेटी की हत्या का आरोप झेल रहे परिवार ने अपने चारों ओर किस तरह से कानूनी शिकंजे को और कस लिया है.
ठोस तौर पर एक तरफ हत्या के पक्ष में तकनीकी कारणों से विवाद में आए पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अलावा कई परिस्थितिजन्य साक्ष्य हैं तो दूसरी तरफ खुदकुशी के पक्ष में एक सुसाइड नोट है जिसके साथ छेड़छाड़ की गई है. पुलिस इसके आगे-पीछे की कड़ी तलाश रही है. प्रियभांशु, निरुपमा और प्रियभांशु के साझे दोस्त इस तलाश में उनकी पूरी मदद कर चुके हैं और आगे भी करने के लिए तैयार हैं. निरुपमा के परिजन पहले दिन से सबूत छुपा रहे हैं, झूठ बोल रहे हैं और बयान बदल रहे हैं.
इस मामले से जुड़ी कुछ चीजें सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं. पुलिस की जांच में अगर कोई ऐसी चीज सामने आई हो जिसके बारे में बाहर नहीं बताया गया है तो हम खुद को उस हिसाब से अंधेरे में मान लेंगे. हम सार्वजनिक रूप से उपलब्ध चीजों के आधार पर अपने यकीन को और मजबूत होता देखते हैं कि निरुपमा की हत्या की गई है, न कि उसने खुदकुशी की है. घटनाक्रम को लेकर हम एक-एक कर आगे बढ़ेंगे और क्रम कुछ दिनों तक चलेगा. आप सच को कहने और समझने में हमारा साथ देंगे, ये भरोसा है.
पुलिस को किसने खबर दी
निरुपमा का परिवार निरुपमा के शव को कोडरमा के पार्वती अस्पताल ले गया और मौत की पुष्टि करके वापस लौट आया. पुलिस को सूचना देना उनके एजेंडे में नहीं था. उनका एजेंडा क्या था, क्या वो रात को सारे सबूत मिटाने की साजिश रच रहे थे, ये पुलिस को पता करना है.
पुलिस वाले कह रहे हैं कि निरुपमा के शव को बोलेरो में पार्वती अस्पताल ले जाने वाले लोग पाठक परिवार के पड़ोसी थे लेकिन अस्पताल के जिस स्टाफ ने निरुपमा का नब्ज और आंख देखकर साथ गए 4-5 लोगों को यह बताया था कि लड़की में जान नहीं बची है, उसने कुछ टीवी चैनलों से ऑन कैमरा कहा है कि साथ आए लोगों को उसने कोडरमा शहर में कभी नहीं देखा था. लेकिन पुलिस उस बात पर ज्यादा यकीन करती दिखती है जो मौत को खुदकुशी की तरफ ले जाता दिखता है. कोडरमा के सिविल सर्जन ने भी तो यही कहा था कि इस हत्या में कम से कम तीन लोगों का हाथ रहा होगा. हमारा मानना है कि पुलिस ने पार्वती अस्पताल गए लोगों के बारे में सही से छानबीन नहीं की नहीं तो भंडाफोड़ वहीं से हो सकता था.
कोडरमा पुलिस को निरुपमा की मौत की खबर दिल्ली से प्रियभांशु और उसके करीबी दोस्तों ने दी. प्रियभांशु को यह सूचना निरुपमा और उसके एक साझी दोस्त ने दी थी. उस लड़की को यह सूचना निरुपमा के दूर के किसी रिश्तेदार ने सवालिया लहजे के साथ दी थी. निरुपमा के घर का पता मांगने पर प्रियभांशु ने ही कोडरमा के एसपी साहब को एसएमएस से भेजा. पुलिस इसके बाद निरुपमा के घर तक गई और करंट लगने से मौत और फांसी लगाकर खुदकुशी की दो सूचना के साथ लौट आई.
पुलिस ने फौरन निरुपमा के शव को अपने कब्जे में नहीं लिया. ऐसा क्यों नहीं किया गया, ये समझ से परे है. शव को उसके घर में ही छोड़ दिया गया ताकि निरुपमा के पिता और भाई के कोडरमा पहुंचने के बाद आगे की कार्यवाही की जाए. ऐसा ही हुआ और मौत के अगले दिन पोस्टमार्टम किया जा सका.
पोस्टमार्टम ज्यादा बारीक और सटीक हो, इसके लिए मेडिकल बोर्ड के गठन की मांग भी दिल्ली से निरुपमा और प्रियभांशु के दोस्तों ने की क्योंकि उन्हें मौत की खबर मिलने के बाद से ही लग रहा था कि ये ऑनर किलिंग है.
साभार- मोहल्ला
निरुपमा पाठक की हत्या और आत्महत्या के पेंच सुलझाने में झारखंड पुलिस को काफी मशक्कत करनी पड़ रही है. निरुपमा को न्याय अभियान का यकीन है कि यह हत्या है और दोहरी हत्या है. एक निरुपमा पाठक की और दूसरा निरुपमा पाठक और प्रियभांशु रंजन के प्यार की निशानी 10-12 सप्ताह के अजन्मे बच्चे की. हम ये भी मानते हैं कि ब्राह्णण जाति से बाहर निरुपमा की शादी की चाहत के कारण उसके परिवार ने हत्या की. निरुपमा के परिवार का कहना है कि ये खुदकुशी है और इसके लिए उसके प्रेमी प्रियभांशु रंजन ने उसे उकसाया और मजबूर किया.
शुक्रवार को हमने कहा था कि झूठ बोलने का झंझट ये है कि आपको उसे हमेशा याद रखना होता है कि किससे, कब और क्या कहा गया था. इस रिपोर्ट में आपको बार-बार इस बात का अहसास होगा कि झूठ बोलकर अपनी बेटी की हत्या का आरोप झेल रहे परिवार ने अपने चारों ओर किस तरह से कानूनी शिकंजे को और कस लिया है.
ठोस तौर पर एक तरफ हत्या के पक्ष में तकनीकी कारणों से विवाद में आए पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अलावा कई परिस्थितिजन्य साक्ष्य हैं तो दूसरी तरफ खुदकुशी के पक्ष में एक सुसाइड नोट है जिसके साथ छेड़छाड़ की गई है. पुलिस इसके आगे-पीछे की कड़ी तलाश रही है. प्रियभांशु, निरुपमा और प्रियभांशु के साझे दोस्त इस तलाश में उनकी पूरी मदद कर चुके हैं और आगे भी करने के लिए तैयार हैं. निरुपमा के परिजन पहले दिन से सबूत छुपा रहे हैं, झूठ बोल रहे हैं और बयान बदल रहे हैं.
इस मामले से जुड़ी कुछ चीजें सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं. पुलिस की जांच में अगर कोई ऐसी चीज सामने आई हो जिसके बारे में बाहर नहीं बताया गया है तो हम खुद को उस हिसाब से अंधेरे में मान लेंगे. हम सार्वजनिक रूप से उपलब्ध चीजों के आधार पर अपने यकीन को और मजबूत होता देखते हैं कि निरुपमा की हत्या की गई है, न कि उसने खुदकुशी की है. घटनाक्रम को लेकर हम एक-एक कर आगे बढ़ेंगे और क्रम कुछ दिनों तक चलेगा. आप सच को कहने और समझने में हमारा साथ देंगे, ये भरोसा है.
पुलिस को किसने खबर दी
निरुपमा का परिवार निरुपमा के शव को कोडरमा के पार्वती अस्पताल ले गया और मौत की पुष्टि करके वापस लौट आया. पुलिस को सूचना देना उनके एजेंडे में नहीं था. उनका एजेंडा क्या था, क्या वो रात को सारे सबूत मिटाने की साजिश रच रहे थे, ये पुलिस को पता करना है.
पुलिस वाले कह रहे हैं कि निरुपमा के शव को बोलेरो में पार्वती अस्पताल ले जाने वाले लोग पाठक परिवार के पड़ोसी थे लेकिन अस्पताल के जिस स्टाफ ने निरुपमा का नब्ज और आंख देखकर साथ गए 4-5 लोगों को यह बताया था कि लड़की में जान नहीं बची है, उसने कुछ टीवी चैनलों से ऑन कैमरा कहा है कि साथ आए लोगों को उसने कोडरमा शहर में कभी नहीं देखा था. लेकिन पुलिस उस बात पर ज्यादा यकीन करती दिखती है जो मौत को खुदकुशी की तरफ ले जाता दिखता है. कोडरमा के सिविल सर्जन ने भी तो यही कहा था कि इस हत्या में कम से कम तीन लोगों का हाथ रहा होगा. हमारा मानना है कि पुलिस ने पार्वती अस्पताल गए लोगों के बारे में सही से छानबीन नहीं की नहीं तो भंडाफोड़ वहीं से हो सकता था.
कोडरमा पुलिस को निरुपमा की मौत की खबर दिल्ली से प्रियभांशु और उसके करीबी दोस्तों ने दी. प्रियभांशु को यह सूचना निरुपमा और उसके एक साझी दोस्त ने दी थी. उस लड़की को यह सूचना निरुपमा के दूर के किसी रिश्तेदार ने सवालिया लहजे के साथ दी थी. निरुपमा के घर का पता मांगने पर प्रियभांशु ने ही कोडरमा के एसपी साहब को एसएमएस से भेजा. पुलिस इसके बाद निरुपमा के घर तक गई और करंट लगने से मौत और फांसी लगाकर खुदकुशी की दो सूचना के साथ लौट आई.
पुलिस ने फौरन निरुपमा के शव को अपने कब्जे में नहीं लिया. ऐसा क्यों नहीं किया गया, ये समझ से परे है. शव को उसके घर में ही छोड़ दिया गया ताकि निरुपमा के पिता और भाई के कोडरमा पहुंचने के बाद आगे की कार्यवाही की जाए. ऐसा ही हुआ और मौत के अगले दिन पोस्टमार्टम किया जा सका.
पोस्टमार्टम ज्यादा बारीक और सटीक हो, इसके लिए मेडिकल बोर्ड के गठन की मांग भी दिल्ली से निरुपमा और प्रियभांशु के दोस्तों ने की क्योंकि उन्हें मौत की खबर मिलने के बाद से ही लग रहा था कि ये ऑनर किलिंग है.
साभार- मोहल्ला
कोडरमा के “खाप” में सारे सनातनी एक साथ
अपने एक गुरुजी कहा करते थे कि सच बोलने का सबसे बड़ा फायदा ये है कि आपको याद रखने की जरूरत नहीं पड़ती कि आपने क्या कहा था और कब कहा था। झूठ बोलने में सबसे बड़ा झंझट है कि आपको हमेशा ये याद रखना होता है कि आपने कब, किससे, क्या कहा था। निरुपमा पाठक हत्याकांड में पाठक परिवार हालांकि सम्मिलित रूप से झूठ बोल रहा है बावजूद इसके निरुपमा के पापा कुछ कहते हैं तो उनकी माता कुछ और। ये उन दोनों के बयान, मुकदमों की कॉपी से भी साबित हो जाता है। वो झूठ इसलिए नहीं बोल रहे हैं कि झूठ बोलना उनकी फितरत है। उनकी दिक्कत ये है कि सच से बचने के लिए वो जो कह रहे हैं, उसे याद नहीं रख पा रहे हैं कि उन्होंने सोमवार को क्या कहा, मंगलवार को क्या कहा या बुधवार को क्या कहा था। नतीजा हुआ है कि वो पहले दिन कुछ कहते हैं और तीसरे दिन कुछ और। झूठ बोलने का नुकसान यही है।
सच बोलते तो हमेशा एक जैसी बातें करते जैसे प्रियभांशु रंजन ने किया। उसने अंतरंग संबंध कबूल किया लेकिन ये भी कहा कि उसे नहीं पता था कि नीरू मां बनने वाली थी। पुलिस वाले बहुत परेशान हुए, उन्होंने प्रियभांशु से भी कई बार पूछा, घुमा-घुमाकर पूछा लेकिन उसका जवाब एक ही था क्योंकि उसे सचमुच नहीं मालूम था। जब यहां पेंच फंसा तो कुछ अखबारों ने महिला डॉक्टरों से बातचीत करके ये बताया कि मेडिकल कारणों से संभव है कि गर्भ के बारे में नीरू को ही पता न हो। ये बात फिर भी कई की समझ में नहीं आ रही। बहरहाल, आईआईएमसी एल्युमनी एसोसिएशन और निरुपमा को न्याय अभियान से जुड़े हजारों लोगों को यकीन है कि प्रियभांशु रंजन सच कह रहा है। निरुपमा की हत्या हुई है और हत्या उसके घर के लोगों ने ही की है या करवाई है और वो सुसाइड नोट की आड़ में सच छुपा रहे हैं।
कोडरमा के प्रभावशाली पाठक परिवार के बयानों से हम विचलित नहीं होंगे। 7 मई को एक ही दिन में जेल से कोर्ट और कोर्ट से थाना तक का सफर तय करने वाली सुधा पाठक की शिकायत ने देश के कई बड़े वकीलों को हैरत में डाल दिया। सीजेएम साहब ने उस शिकायत पर आदेश जारी करने से पहले पुलिस से रिपोर्ट क्यों नहीं मांगी, ये सवाल हर किसी के मन में है। इस शिकायत के आधार पर दर्ज मामले में प्रियभांशु रंजन पर बलात्कार, शादी का झांसा देकर संबंध बनाने और खुदकुशी के लिए निरुपमा को उकसाने या मजबूर करने का आरोप लगाया गया है।
हमारा 200 फीसदी यकीन है कि निरुपमा की हत्या की गयी है। बावजूद, उसके परिवार के खुदकुशी के दावे को पुलिस की जांच वैज्ञानिक तरीके से अगर साबित कर भी देती है तो भी आत्महत्या के लिए मजबूर करने का आरोप, उसकी जवाबदेही पाठक परिवार पर बनती है, न कि प्रियभांशु रंजन पर। पाठक परिवार को ये सलाह किसी वकील साहब ने दी होगी कि प्रियभांशु रंजन को मुकदमे में लपेटो क्योंकि हत्या के मामले में वह अहम गवाह होगा। बाद में समझौता करके उसे बरी कर देना और खुद भी बच लेना। निरुपमा को न्याय अभियान पाठक परिवार के वकीलों को साफ करना चाहता है कि ये अभियान ऐसा कोई समझौता नहीं होने देगा और निरुपमा को न्याय दिलाने की लड़ाई में कोई भी गवाह हॉस्टाइल नहीं होगा। अगर ऐसी किसी कोशिश में प्रियभांशु भी पाठक परिवार से हाथ मिलाते नजर आए तो उनके खिलाफ भी लड़ाई लड़ी जाएगी क्योंकि यह अभियान निरुपमा को न्याय दिलाने की जिद के साथ शुरू हुआ है।
पाठक परिवार के प्रभाव में कोडरमा के दो-तीन पत्रकार ‘सूत्रों का कहना है, बताया जाता है’ जैसी लफ्फाजी के साथ तथ्यों के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। जिस एसएमसएस को आखिरी एसएमएस बताया जा रहा है, वो एसएमएस प्रियभांशु को 28 अप्रैल की रात 8 बजे से मिलना शुरू हो गया था और 29 अप्रैल की सुबह 5:39 बजे जब वही एसएमएस आया तो वह तीसरी बार था। कोडरमा पुलिस के अधिकारी शिव प्रसाद जब दिल्ली आए थे तो उन्होंने पूछताछ के दौरान बुलाए गए बच्चों को नसीहत दी कि बच्चों को घर वालों की मर्जी से शादी करनी चाहिए, दूसरी जाति में शादी नहीं करनी चाहिए, उनकी भी एक बेटी और एक बेटा है, अगर वो निरुपमा की तरह करेंगे तो उन्हें भी ये मंजूर नहीं होगा। ऐसी घटिया सोच वाले अधिकारियों के दम पर मामला सुलझाने निकली राज्य पुलिस क्या खोजेगी, क्या निकालेगी, ऊपर वाले को ही पता होगा।
कोडरमा में कोई चुनाव हो रहा है तो राजनीतिक दलों के नेता भी इस मामले में पाठक परिवार के साथ नाइंसाफी की आवाज उठा रहे हैं। ये उनकी राजनीति है। हमने राजनीति को अब तक इसमें शामिल नहीं किया है। लेकिन निरुपमा को न्याय दिलाने के लिए हमें राजनेताओं के दरवाजे खटखटाने और उनसे मदद मांगने से कोई परहेज नहीं है। कोडरमा के कांग्रेस जिलाध्यक्ष ओझा साहब प्रियभांशु को तुरंत गिरफ्तार करने की मांग कर रहे हैं जबकि कांग्रेस के राज्य प्रभारी केशव राव पाठक परिवार के प्रभाव को देखते हुए मामले की सीबीआई से जांच की वकालत कर रहे हैं। निरुपमा को न्याय अभियान की तरफ से कोडरमा खाप पंचायत को उनकी नैतिकता और सनातनी सोच मुबारक हो। निरुपमा को न्याय दिलाने के लिए हम सर्वोच्च न्यायालय तक जाएंगे। रास्ते में पाठक परिवार के साथ कोडरमा का सर्वदलीय खाप भी आता है तो हमें परवाह नहीं है।
निरुपमा की हत्या हुई है, यह साबित करने के लिए इतने सारे सबूत हैं कि हमें यकीन है कि पूरे देश के सनातनधर्मी एकजुट हो जाएंगे तो भी पाठक परिवार को नहीं बचा पाएंगे क्योंकि कानून की लड़ाई सनातनी नैतिकता की दुहाई पर नहीं, तथ्य और सबूत पर लड़ी जाएगी। हम जीतेंगे, निरुपमा के हत्यारे हारेंगे क्योंकि इसके बिना निरुपमा की आत्मा को शांति नहीं मिलेगी। निरुपमा की लड़ाई हमारे लिए सत्येंद्र दुबे और मंजूनाथ की लड़ाई है और हम अपील करते हैं कि आईआईएम और आईआईटी के मित्र भी हमारी मदद करें क्योंकि निरुपमा धार्मिक भ्रष्टाचार से लड़ते हुए शहीद हुई है।
आज की यह पोस्ट तथ्य कम और भाषण ज्यादा है, इसके लिए क्षमाप्रार्थी हूं। शनिवार को निरुपमा को न्याय अभियान हत्याकांड से जुड़े उन सबूतों के आधार पर सिर्फ ठोस बात रखेगा, जो सबूत सबके सामने हैं। पाठक परिवार से प्रभावित लोग उन सबूतों को नजरअंदाज करके नैतिकता की रट लगाए बैठे हैं। पुलिस की जांच में सामने आई ऐसी कोई चीज जो हमारी जानकारी में नहीं है, वो जाहिर तौर पर इसमें शामिल नहीं होगी।
साभार- मोहल्ला
सच बोलते तो हमेशा एक जैसी बातें करते जैसे प्रियभांशु रंजन ने किया। उसने अंतरंग संबंध कबूल किया लेकिन ये भी कहा कि उसे नहीं पता था कि नीरू मां बनने वाली थी। पुलिस वाले बहुत परेशान हुए, उन्होंने प्रियभांशु से भी कई बार पूछा, घुमा-घुमाकर पूछा लेकिन उसका जवाब एक ही था क्योंकि उसे सचमुच नहीं मालूम था। जब यहां पेंच फंसा तो कुछ अखबारों ने महिला डॉक्टरों से बातचीत करके ये बताया कि मेडिकल कारणों से संभव है कि गर्भ के बारे में नीरू को ही पता न हो। ये बात फिर भी कई की समझ में नहीं आ रही। बहरहाल, आईआईएमसी एल्युमनी एसोसिएशन और निरुपमा को न्याय अभियान से जुड़े हजारों लोगों को यकीन है कि प्रियभांशु रंजन सच कह रहा है। निरुपमा की हत्या हुई है और हत्या उसके घर के लोगों ने ही की है या करवाई है और वो सुसाइड नोट की आड़ में सच छुपा रहे हैं।
कोडरमा के प्रभावशाली पाठक परिवार के बयानों से हम विचलित नहीं होंगे। 7 मई को एक ही दिन में जेल से कोर्ट और कोर्ट से थाना तक का सफर तय करने वाली सुधा पाठक की शिकायत ने देश के कई बड़े वकीलों को हैरत में डाल दिया। सीजेएम साहब ने उस शिकायत पर आदेश जारी करने से पहले पुलिस से रिपोर्ट क्यों नहीं मांगी, ये सवाल हर किसी के मन में है। इस शिकायत के आधार पर दर्ज मामले में प्रियभांशु रंजन पर बलात्कार, शादी का झांसा देकर संबंध बनाने और खुदकुशी के लिए निरुपमा को उकसाने या मजबूर करने का आरोप लगाया गया है।
हमारा 200 फीसदी यकीन है कि निरुपमा की हत्या की गयी है। बावजूद, उसके परिवार के खुदकुशी के दावे को पुलिस की जांच वैज्ञानिक तरीके से अगर साबित कर भी देती है तो भी आत्महत्या के लिए मजबूर करने का आरोप, उसकी जवाबदेही पाठक परिवार पर बनती है, न कि प्रियभांशु रंजन पर। पाठक परिवार को ये सलाह किसी वकील साहब ने दी होगी कि प्रियभांशु रंजन को मुकदमे में लपेटो क्योंकि हत्या के मामले में वह अहम गवाह होगा। बाद में समझौता करके उसे बरी कर देना और खुद भी बच लेना। निरुपमा को न्याय अभियान पाठक परिवार के वकीलों को साफ करना चाहता है कि ये अभियान ऐसा कोई समझौता नहीं होने देगा और निरुपमा को न्याय दिलाने की लड़ाई में कोई भी गवाह हॉस्टाइल नहीं होगा। अगर ऐसी किसी कोशिश में प्रियभांशु भी पाठक परिवार से हाथ मिलाते नजर आए तो उनके खिलाफ भी लड़ाई लड़ी जाएगी क्योंकि यह अभियान निरुपमा को न्याय दिलाने की जिद के साथ शुरू हुआ है।
पाठक परिवार के प्रभाव में कोडरमा के दो-तीन पत्रकार ‘सूत्रों का कहना है, बताया जाता है’ जैसी लफ्फाजी के साथ तथ्यों के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। जिस एसएमसएस को आखिरी एसएमएस बताया जा रहा है, वो एसएमएस प्रियभांशु को 28 अप्रैल की रात 8 बजे से मिलना शुरू हो गया था और 29 अप्रैल की सुबह 5:39 बजे जब वही एसएमएस आया तो वह तीसरी बार था। कोडरमा पुलिस के अधिकारी शिव प्रसाद जब दिल्ली आए थे तो उन्होंने पूछताछ के दौरान बुलाए गए बच्चों को नसीहत दी कि बच्चों को घर वालों की मर्जी से शादी करनी चाहिए, दूसरी जाति में शादी नहीं करनी चाहिए, उनकी भी एक बेटी और एक बेटा है, अगर वो निरुपमा की तरह करेंगे तो उन्हें भी ये मंजूर नहीं होगा। ऐसी घटिया सोच वाले अधिकारियों के दम पर मामला सुलझाने निकली राज्य पुलिस क्या खोजेगी, क्या निकालेगी, ऊपर वाले को ही पता होगा।
कोडरमा में कोई चुनाव हो रहा है तो राजनीतिक दलों के नेता भी इस मामले में पाठक परिवार के साथ नाइंसाफी की आवाज उठा रहे हैं। ये उनकी राजनीति है। हमने राजनीति को अब तक इसमें शामिल नहीं किया है। लेकिन निरुपमा को न्याय दिलाने के लिए हमें राजनेताओं के दरवाजे खटखटाने और उनसे मदद मांगने से कोई परहेज नहीं है। कोडरमा के कांग्रेस जिलाध्यक्ष ओझा साहब प्रियभांशु को तुरंत गिरफ्तार करने की मांग कर रहे हैं जबकि कांग्रेस के राज्य प्रभारी केशव राव पाठक परिवार के प्रभाव को देखते हुए मामले की सीबीआई से जांच की वकालत कर रहे हैं। निरुपमा को न्याय अभियान की तरफ से कोडरमा खाप पंचायत को उनकी नैतिकता और सनातनी सोच मुबारक हो। निरुपमा को न्याय दिलाने के लिए हम सर्वोच्च न्यायालय तक जाएंगे। रास्ते में पाठक परिवार के साथ कोडरमा का सर्वदलीय खाप भी आता है तो हमें परवाह नहीं है।
निरुपमा की हत्या हुई है, यह साबित करने के लिए इतने सारे सबूत हैं कि हमें यकीन है कि पूरे देश के सनातनधर्मी एकजुट हो जाएंगे तो भी पाठक परिवार को नहीं बचा पाएंगे क्योंकि कानून की लड़ाई सनातनी नैतिकता की दुहाई पर नहीं, तथ्य और सबूत पर लड़ी जाएगी। हम जीतेंगे, निरुपमा के हत्यारे हारेंगे क्योंकि इसके बिना निरुपमा की आत्मा को शांति नहीं मिलेगी। निरुपमा की लड़ाई हमारे लिए सत्येंद्र दुबे और मंजूनाथ की लड़ाई है और हम अपील करते हैं कि आईआईएम और आईआईटी के मित्र भी हमारी मदद करें क्योंकि निरुपमा धार्मिक भ्रष्टाचार से लड़ते हुए शहीद हुई है।
आज की यह पोस्ट तथ्य कम और भाषण ज्यादा है, इसके लिए क्षमाप्रार्थी हूं। शनिवार को निरुपमा को न्याय अभियान हत्याकांड से जुड़े उन सबूतों के आधार पर सिर्फ ठोस बात रखेगा, जो सबूत सबके सामने हैं। पाठक परिवार से प्रभावित लोग उन सबूतों को नजरअंदाज करके नैतिकता की रट लगाए बैठे हैं। पुलिस की जांच में सामने आई ऐसी कोई चीज जो हमारी जानकारी में नहीं है, वो जाहिर तौर पर इसमें शामिल नहीं होगी।
साभार- मोहल्ला
Candle Light Protest at Jantar Mantar
Press Release
New Delhi, 8 May. “Justice for Nirupama” campaign has demanded high level CBI inquiry into Nirupama murder case. It said that local police is messing and derailing the whole investigation. The campaign has appealed the Jharkhand Government to ensure fair investigation with high level supervision.
The Campaign is highly surprised, shocked and pained to see the frivolous charges leveled against Priyabhanshu by the family members of Nirupama. The initial investigation has already established that her family members are habitual liars as they are changing their statement from the beginning.
The campaign believed that this is a ploy to divert the attention of investigation and confuse the police and public. Unfortunately it seems that police is also playing in the hand of conspirators and murderers.
The Campaign has said that autopsy report of Nirupama has confirmed the murder and not suicide. The police have filed FIR against her mother and two-three others.
The campaign today organized a Candle light vigil at Jantar Mantar in which hundreds of batchmates, colleagues, students, teachers, journalists, representatives of women organizations, students, human rights organizations participated.
New Delhi, 8 May. “Justice for Nirupama” campaign has demanded high level CBI inquiry into Nirupama murder case. It said that local police is messing and derailing the whole investigation. The campaign has appealed the Jharkhand Government to ensure fair investigation with high level supervision.
The Campaign is highly surprised, shocked and pained to see the frivolous charges leveled against Priyabhanshu by the family members of Nirupama. The initial investigation has already established that her family members are habitual liars as they are changing their statement from the beginning.
The campaign believed that this is a ploy to divert the attention of investigation and confuse the police and public. Unfortunately it seems that police is also playing in the hand of conspirators and murderers.
The Campaign has said that autopsy report of Nirupama has confirmed the murder and not suicide. The police have filed FIR against her mother and two-three others.
The campaign today organized a Candle light vigil at Jantar Mantar in which hundreds of batchmates, colleagues, students, teachers, journalists, representatives of women organizations, students, human rights organizations participated.
Silent Protest March at Home Ministry
Press Release/May 15, 2010
To demand a CBI investigation into the Nirupama Pathak murder case, a silent protest march was carried out from Press Club to the Home Ministry, on a joint call from the Press Club of India, The Indian Women Press Corp, Justice for Nirupama Campaign and the IIMC Alumni Association.
The demonstration, carried out to demand justice for journalist Nirupama Pathak, was led by Press Club of India General Secretary Pushpendra Kulshrestha, DUJ President S K Pandey, Senior Journalists Ram Bahadur Rai, Anand Swaroop Verma, Prof Subhash Dhulia, Prof Anand Pradhan, Dilip Mandal, Anil Chamadia and Rajesh Verma; Educationists Prof Anand Kumar, Proj Ajit Jha; social activists working for women’s rights Ranjana Kumari, Sudha Sundarraman, Jagmati Sangwan; and Sucheta, Roshan Kishor and Vijay Pratap from students’ organisations. Besides, journalists, students, teachers, writers and representatives from women and social organizations also turned out in huge numbers.
Two days ago, Jharkhand DGP Neyaz Ahmed had said that the investigation so far indicated that Nirupama had been murdered. Justice for Nirupama Campaign had been pointing out since Day 1 that Nirupama had been murdered because she wanted to get married out of her caste. It is for everyone to see that some officials involved in the probe and the Pathak family have tried to twist the issue and turn the course of investigation in a different direction.
Journalists who participated in the silent march demanded that the case be transferred immediately to the Central Bureau of Investigation (CBI) because the Koderma Police had been handling the case in a very lax, callous and careless way. They added, it also appeared that the officials had been working under pressure from the Pathak family and some political parties. The journalists also demanded that the evidences related to the case be duly preserved because the Pathak family had been hiding and destroying key evidences. It was also sought that the case be tried in a fast-track court so that a strong case could be made against ‘honour killings’ and such a heinous crime could be stopped at once.
To demand a CBI investigation into the Nirupama Pathak murder case, a silent protest march was carried out from Press Club to the Home Ministry, on a joint call from the Press Club of India, The Indian Women Press Corp, Justice for Nirupama Campaign and the IIMC Alumni Association.
The demonstration, carried out to demand justice for journalist Nirupama Pathak, was led by Press Club of India General Secretary Pushpendra Kulshrestha, DUJ President S K Pandey, Senior Journalists Ram Bahadur Rai, Anand Swaroop Verma, Prof Subhash Dhulia, Prof Anand Pradhan, Dilip Mandal, Anil Chamadia and Rajesh Verma; Educationists Prof Anand Kumar, Proj Ajit Jha; social activists working for women’s rights Ranjana Kumari, Sudha Sundarraman, Jagmati Sangwan; and Sucheta, Roshan Kishor and Vijay Pratap from students’ organisations. Besides, journalists, students, teachers, writers and representatives from women and social organizations also turned out in huge numbers.
Two days ago, Jharkhand DGP Neyaz Ahmed had said that the investigation so far indicated that Nirupama had been murdered. Justice for Nirupama Campaign had been pointing out since Day 1 that Nirupama had been murdered because she wanted to get married out of her caste. It is for everyone to see that some officials involved in the probe and the Pathak family have tried to twist the issue and turn the course of investigation in a different direction.
Journalists who participated in the silent march demanded that the case be transferred immediately to the Central Bureau of Investigation (CBI) because the Koderma Police had been handling the case in a very lax, callous and careless way. They added, it also appeared that the officials had been working under pressure from the Pathak family and some political parties. The journalists also demanded that the evidences related to the case be duly preserved because the Pathak family had been hiding and destroying key evidences. It was also sought that the case be tried in a fast-track court so that a strong case could be made against ‘honour killings’ and such a heinous crime could be stopped at once.
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